Saturday, June 23, 2012

ख़ामोशी

 ये वाला मेरे दिल के काफी करीब है, सुनती आ रही हूँ बचपन से लेकिन शायद समझ नहीं पाई ख़ामोशी को कभी...अपनी ख़ामोशी भी नहीं।...किसी और की ख़ामोशी भी नहीं ....काश समझ पाती  तो मैं थोडा और 'इंसान ' कहलाती ....

" होश वालों को खबर क्या...
बेखुदी क्या चीज़ है
इश्क कीजिये फिर समझिये
ज़िन्दगी क्या चीज़ है !
उनसे नज़रें क्या मिली
रोशन फिजायें हो गयीं
आज जाना  जादूगरी क्या चीज़ है
इश्क कीजिये फिर समझिये
ज़िन्दगी क्या चीज़ है !
बिखर जुल्फों ने सिखाई
मौसमों को शायर
झुकती आँखों ने बताया
मैकशी क्या चीज़ है
 इश्क कीजिये फिर समझिये
ज़िन्दगी क्या चीज़ है !  हम लबों से कह न पाए
हाल-ए -दिल कभी
और वो समझ न पाए
ये ख़ामोशी क्या चीज़ है
इश्क कीजिये फिर समझिये
ज़िन्दगी क्या चीज़ है !"
हां मैं इंसान हूँ लेकिन और भी ज्यादा इंसान बनना चाहती हूँ। आंसू ,हँसी ,ख़ुशी ... कुछ भी आसानी से नहीं एहसास होता मुझे . सबकी जगह दर्द होता है।..एक अनजान, तीखा चुभता हुआ दर्द ...दिमाग की नसें फटने लगती हैं, सब कुछ जैसे खाली हो जाता है...और उसके बाद ये दर्द बना रहता है कई दिन ...मैं खामोश रहती  हूँ लेकिन ये दर्द सारी  कहानी कह जाता है।

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